Read Horror Story in Hindi - Rahasyamayee Safar Part 4/60 | पढ़ें भूतों की कहानियां - रहस्यमयी सफर भाग - 4/60 | Dingdongdom Stories

 

Read Horror Story in Hindi - Rahasyamayee Safar Part 4/60 | पढ़ें भूतों की कहानियां - रहस्यमयी सफर भाग - 4/60 | Dingdongdom Stories hd images jpg

रहस्यमयी सफ़र (भाग- 4)


मेरी बात अभी आधी ही हुई थी कि तभी वहाँ पास मे खड़े यात्री ने मेरा बचाव करते हुए कहा, “अरे जाने दो बेटी, गलती इसकी नहीं कंडक्टर की है?”


उस यात्री कि बात सुनते ही मैं चौंक गया और मेरे बोलने से पहले वो बोल पड़ी,


“अच्छा, वह भला कैसे?”


वह यात्री बोला, “बेटी बात दरअसल यह है कि जब भी बस देहारादून आई॰एस॰बी॰टी॰ से चलती है तो Calemantown से कुछ दूरी पर जैसे ही आगे बढ़ती है तो एक लंबी गुफा पड़ती है। जो कि पहाड़ के दूसरी तरफ निकलती है जहां गुफा के खत्म होते ही माँ डॉट काली का मंदिर है। गुफा के शुरुआत से अन्त तक अंदर पूरा का पूरा ही अंधेरा होता है। यह बात कंडक्टर को पहले से पता थी तो उसे bus लाइट पहले से ही जला देनी चाहिए थी।”


इतने हंगामे की वजह से conductor भी वहीं मौजूद था। उस यात्री की बात सुनते ही वह तपाक से बोल पड़ा, “अरे! भाई मैं मानता हूँ की मुझसे भूल हो गयी लें मैं क्या करता, उस वक़्त मैं बस के सबसे पिछले हिस्से मे था और bus मे चढ़े यात्रियों की संख्या को crosscheck कर के note कर रहा था, इस वजह से lights on नहीं कर सका।”


उसके इस तरह से सफाई देने पर मुझे लगा की मेरी गलती पर वह काफी हद तक वो पर्दा डालने में कामयाब हुआ था। उसकी बातों से मुझे ऐसा feel हुआ की सभी के समझ मे यह बात आ गई हैं की वह गलती जिसे उस लड़की ने गुनाह बना कर 


साबित करने की कोशिश की थी वह मुझसे अनजाने मे ही हुई थी। सभी अपने अपनी seats पर बैठ गए  और मैं भी अपनी जगह पर बैठ गया था। मेरी उसके बाद हिम्मत नहीं हुई की उस लड़की की तरफ नजर उठा के भी देखने की कोशिश करूँ। मैं दूसरी बार किसी लड़की से इतना कभी डरा था।


तभी अचानक टन्नsss के स्वर की आवृति हुई और मैने देखा कि कुछ लोग हाथ जोड़कर खिड़की से बाहर देख रहे थे। लोगो की आस्था इतनी देर रात भी देख के मन प्रसन्न हो गया।


डाटकाली मंदिर हिन्दुओ का एक प्रसिद्ध मंदिर है , जो कि सहारनपुर देहरादून हाईवे रोड पर स्थित है। डाट काली मंदिर देहरादून के प्रसिद्ध मंदिरों में से एक है तथा देहरादून नगर से 14 किमी की दुरी पर स्थित है। यह मंदिर माँ काली को समर्पित है इसलिए मंदिर को काली का मंदिर भी कहा जाता है एवम् काली माता को भगवान शिव की पत्नी “देवी सती” का अंश माना जाता है। माँ डाट काली मंदिर को “मनोकामना सिध्पीठ” व “काली मंदिर” के नाम से भी जाना जाता है |


डाट काली मंदिर के बारे में यह माना जाता है कि माता डाट काली मंदिर देहरादून में स्थित मुख्य सिध्पीठो में से एक है | डाट काली मंदिर में एक बड़ा सा हाल भी स्थित है। इस मंदिर का निर्माण 13 वीं शताब्दी में 13 जून 1804 में किया गया था | 

जब मंदिर का निर्माण कार्य किया जा रहा था तो ऐसा माना जाता है कि माँ काली एक इंजीनियर के सपने में आई थी और जिन्होंने मंदिर की स्थापना के लिए महंत सुखबीर गुसैन को देवी काली की मूर्ति दी थी , जो कि वर्तमान समय में घाटी के मंदिर में स्थापित है | इसलिए इस मंदिर को "डाट काली मंदिर" कहा जाता है।


अंग्रेजों को दून घाटी में प्रवेश करने के लिए इस मंदिर के समीप सुरंग बनानी पड़ी। लेकिन तमाम कोशिशों के बाद भी जब सुरंग का काम पूरा नहीं हुआ तो अंग्रेजों को भी डाट काली के दरबार में शीश नवाना पड़ा था। गोरखा सेनापति बलभद्र थापा ने यहीं पर भद्रकाली मंदिर की स्थापना की थी इसलिए डाट काली मंदिर के निकट ही एक प्राचीन “भद्रकाली मंदिर” स्थित है । भक्त मानते हैं कि माँ डाट काली का शेर, जिसके पैर में सोने का कड़ा है आज भी शिवालिक पर्वत श्रेणी में घूमता रहता है।


मान्यता है कि किसी भी मंगलवार से 11 दिन तक विश्वास पूर्वक किया गया डाट 


चालीसा पाठ बड़े-बड़े कष्ट हर लेता है। माँ डाट काली मंदिर की मुख्य विशेषता यह है कि इस मंदिर के अन्दर एक दिव्य ज्योति जली रहती है , जो कि 1921 से लगातार जल रही है। इस मंदिर के प्रति इस क्षेत्र में रहने वालो लोगों की अत्यंत श्रधा है क्यूंकि इस क्षेत्र के आसपास के लोग जब भी कोई नया वाहन खरीदते है तो क्षेत्र के लोग इस मंदिर में पूजा करने के लिए माँ डाट काली मंदिर में जरुर लाते है।


यह मंदिर देहरादून-सहारनपुर रोड के किनारे पर स्थित है इसलिए जो भी व्यक्ति यहाँ से जाता है वो माँ काली का आशीर्वाद जरुर लेता है और मंदिर में तेल ,गुड ,घी ,आटा व अन्य वस्तु देवी के समक्ष प्रस्तुत करता है।

तभी मेरा ध्यान बस में खड़े यात्रियों के ऊपर पड़ी जो अपनी जगह से खड़े हो गए थे और वो खिड़की से बाहर सिक्के फेंकने की कोशिश कर रहे थे। मैने ध्यान से खिड़की के बाहर देखा तो एक मंदिर था जहां किसी देवी की सुंदर सी प्रतिमा विधमन थी। काफी सारे लोग वहाँ मंदिर के बाहर line मे अपनी बारी आने की प्रतीक्षा कर रहे थे। तभी वह नकचढ़ी लड़की जो मेरे बाजू मे बैठी थी वह मुंह घूमाते हुए बोली,


“What the rubbish, Peoples are really fools॰ माता को पैसे ऐसे चढ़ा रहे हैं जैसे देवी को उसकी कमी हो।”


इस बार उस लड़की की बातें मेरे दिल मे चोट कर गईं। मुझे यही सिखाया गया था कि किसी का सम्मान ना कर सको तो आपको उसके अपमान करने का भी कोई हक नहीं है। चूंकि जाति से मैं ब्राह्मण ही था तो इस बात का बुरा लगना मेरे लिए 

स्वाभाविक था इसलिए मैं बोला, “किसी के आस्थाओं का हमे मज़ाक नहीं बनाना चाहिए।”


“तो फिर माता को इस तरह पैसे फेंकने का क्या मतलब है?”


“मैं मानता हूँ कि इस तरह से सिक्के फेंकना समझदारी तो बिल्कुल भी नहीं है लेकिन वह उनका अपना तरीका है न कि किसी वेद मे ऐसा लिखा है कि आप ऐसा करें।”


“तुम्हें नहीं लगता कि जो अयोध्या में राम जन्म भूमि पर मंदिर और मस्जिद कि लड़ाई हो रही है उसका एक ही समाधान है कि उस जगह गरीबों के लिए एक अस्पताल ही बना दी जाए?”


“बिल्कुल नहीं मैं इस बात का बिल्कुल समर्थन नहीं करता। उस जगह तो राम मंदिर ही बनना चाहिए?”


“अच्छा वो भला क्यों? तुम्हारे पास कोई  ठोस वजह तो बोलो?”


“बिल्कुल है। अच्छा ये बताओ कि तुम्हारी स्कूटी यदि पंक्चर होती है तो तुम कहाँ जाती हो?”


“मैकेनिक के पास और कहाँ?”


“अरे तो लेकिन हवा तो तुम्हारे चारो ओर मौजूद है, वहाँ से क्यों नहीं भरती?”


“पागल हो क्या? भला हवा ऐसे कैसे भरी जा सकती है, वो तो कोई मैकेनिक मशीन से ही तो भरेगा ना?”


“Exactly उसी तरह भगवान श्री राम तो हर जगह निवास करते हैं हर कण-कण में लेकिन ऐसी कोई तो जगह होनी चाहिए, ऐसा कोई ठोस कारण तो होना चाहिए जिसकी वजह से हमारा श्रद्धा से सिर झुके।”


“बात में तो दम है Mister, अच्छा तो फिर शिवलिंग पर दूध चढ़ाने का क्या अभिप्राय है?”


“देखो, हर परंपरा और रीति रिवाजों के पीछे कोई ना कोई वैज्ञानिक कारण होता है। हम इस बारे में नहीं जानते क्योंकि हमें इसके बारे में कोई जानकारी नहीं होती, लेकिन जानकारी के अभाव में हम अधिकतर उसका मज़ाक बनाने से भी नहीं चूकते। मैं तुम्हें एक नहीं बल्कि तीन तरह से समझाने की कोशिश करूंगा कि शिवलिंग पर दूध क्यों चढ़ाया जाता है। बस ध्यान से सुनती जाना।”


“Wow, I am so excited but तुम्हारे answers मेरे questions को संतुष्ट करेंगे तो बेशक। Please go ahead॰”


“तो सबसे पहला ऐसा करने के पीछे एक पौराणिक कथा है, समुद्र मंथन के दौरान जब विष निकला तो पूरी पृथ्वी पर विष की घातकता के कारण व्याकुलता छा गयी, ऐसे में सभी देवों ने भगवान् शिव से विषपान करने की प्रार्थना की।  

भगवान् शिव ने जब विषपान किया तो विष के कारण उनका गला नीला होने लगा ऐसे में सभी देवों ने उनसे विष की घातकता को कम करने के लिए शीतल दूध का पान करने के लिए कहा। भगवान शिव ने उसका सेवन किया, जिससे विष का असर काफ़ी कम हो गया। 

बाकी बचे विष को सर्पों ने पिया। इस तरह समुद्र मंथन से निकले हलाहल विष से सृष्टि की रक्षा की जा सकी। शिव के शरीर में जाकर विष के अनिष्टकारी प्रभाव को कम करने के कारण दूध भगवान् शिव को अत्यंत प्रिय है, यही कारण है कि शिवलिंग पर दूध जरूर चढ़ाया जाता है।”


“तुम्हारे इस जवाब से मैं कुछ हद तक संतुष्ट हो पाई हूँ, तुम्हारा दूसरा जवाब क्या है?”


“दूसरा कारण है वैज्ञानिक कारण, आयुर्वेद के अनुसार वर्षा ऋतू में दूध का सेवन निषेध है! सर्व विदित है कि वर्षा ऋतू में जल से जड़ित अनेक रोग होते है। भारत कि ज़्यादातर परम्पराओ और प्रथाओं के पीछे कोई न कोई वैज्ञानिक कारण अवश्य मौजूद है। जिसकी वजह से ये परम्पराएं और प्रथाएं सदियों से चली आ रहीं हैं। 

शिवलिंग पर दूध चढ़ाना भी ऐसे ही एक वैज्ञानिक कारण से जुड़ा हुआ है। आयुर्वेद कहता है कि खासतौर पर सावन (श्रावण) के महीने में मौसम बदलने के कारण बहुत सी बीमारियां होने की संभावना रहती है, क्योंकि इस मौसम में वात-पित्त और कफ़ के सबसे ज्यादा असंतुलित होने की संभावना रहती है।


सावन के मौसम में बारिश के कारण जगह-जगह कई तरह की घास-फूस भी उग आती है, जिसका सेवन मवेशी कर लेते हैं, लेकिन यह उनके दूध को ज़हरीला भी बना सकता है। श्रावण के महीने में ऋतू परिवर्तन के कारण शरीर मे वात बढ़ता है। 

इस वात को कम करने के लिए क्या करना पड़ता है? ऐसी चीज़ें नहीं खानी चाहिएं जिनसे वात बढे, इसलिए पत्ते वाली सब्जियां नहीं खानी चाहिएं! और उस समय पशु क्या खाते हैं? सब घास और पत्तियां ही तो खाते हैं। इस कारण उनका दूध भी वात को बढाता है। ऐसे में दूध का सेवन करने से आप मौसमी और संक्रामक बीमारियों की चपेट में जल्दी आ सकते हैं। 

इसलिए आयुर्वेद कहता है कि श्रावण के महीने में दूध नहीं पीना चाहिए। इसलिए श्रावण मास में जब हर जगह शिव रात्रि पर दूध चढ़ता था तो लोग समझ जाया करते थे कि इस महीने मे दूध विष के सामान है, स्वास्थ्य के लिए अच्छा नहीं है, इस समय दूध पिएंगे तो वाइरल इन्फेक्शन से बरसात की बीमारियाँ फैलेंगी और वो दूध नहीं पिया करते थे। इसलिए पुराने समय में लोग सावन के महीने में दूध शिवलिंग पर चढ़ा देते थे। 

ऐसे में इस मौसम में दूध के इस अवगुण को भी हरने के लिए एक बार फिर भोलेनाथ, शिवलिंग के रूप में समाधान बनकर सामने आते हैं और सावन में शिव को दूध अर्पित करने की प्रथा बनाई गई है। दूध को शिवलिंग पर अर्पित करके आम लोग मौसम की कई बीमारियों के साथ-साथ दूध के कई अवगुणों से ग्रसित होने से बच पाते हैं। इन्हीं कारणों से सदियों से शिवलिंग पर दूध चढ़ाया जाता आ रहा है। इसलिए शिवलिंग पर जल चढ़ाना केवल आध्यात्मिक दृष्टि से ही नहीं बल्कि वैज्ञानिक दृष्टि से भी उचित है।”


तो बताओ अब तो मानोगी ना कि वो शिवलिंग पर दूध चढाना समझदारी है? ज़रा गौर करो, हमारी परम्पराओं के पीछे कितना गहन विज्ञान छिपा हुआ है! ये इस देश का दुर्भाग्य है कि हमारी परम्पराओं को समझने के लिए जिस विज्ञान की आवश्यकता है वो हमें पढ़ाया नहीं जाता और विज्ञान के नाम पर जो हमें पढ़ाया जा रहा है उस से हम अपनी परम्पराओं को समझ नहीं सकते! जिस संस्कृति की कोख से हमने जन्म लिया है वो सनातन है, विज्ञान को परम्पराओं का जामा इसलिए पहनाया गया है ताकि वो प्रचलन बन जाए और हम भारतवासी सदा वैज्ञानिक जीवन जीते रहें!


“वाह तुम्हारे इस वैज्ञानिक और आयुर्वेदिक ज्ञान ने तो मेरी आंखे ही खोल दिये। वास्तव मे हर भारत मे हर पौराणिक के पीछे एक प्रभावकारी मत है लेकिन मैं फिर भी तुम्हारा तीसरा मत भी सुनना चहुंगी क्योकि मुझे पता है कि वह भी बड़ा प्रभावशाली होगा।”