Read Horror Story in Hindi - Rahasyamayee Safar Part 2/60 | पढ़ें भूतों की कहानियां - रहस्यमयी सफर भाग - 2/60 | Dingdongdom Stories

 

Read Horror Story in Hindi - Rahasyamayee Safar Part 2/60 | पढ़ें भूतों की कहानियां - रहस्यमयी सफर भाग - 2/60 | Dingdongdom Stories HD Images jpg

रहस्यमयी सफ़र (भाग-2)

उसने यह कहते के साथ अपनी दोनों आँखों को बंद किया और उस त्रिशूल को मेरी तरफ फेंक दिया। वह त्रिशूल क आधा हिस्सा मेरे सीने को भेदते हुए पीठ से बाहर निकल चुका था। मैं जोर से चीखा,

“नहींsss मुझे बचा लो, मैंने तुम लोगों का क्या बिगाड़ा था। मैं इतनी जल्दी मरना नहीं चाहता!”

यह कहते के साथ मेरी आँख खुल गई और खुलने पर मझे ऐसा लगा जैसे कोई मुझे चीख-चीख कर पुकार रहा है। मैंने देखा तो मेरे सामने मेरी माँ, दादा जी और मेरी बहन शगुन मुझे देखकर हँस रहे थे। मेरा जिस्म पसीने से तर था और दिल की धड़कन बहुत तेजी से चल रही थी। उन लोगों ने मेरी हालत देख कर हंसी आ रही थी। मेरी माँ बोली,

“तो जनाब कर आए फिर से उसी समुद्र कि सैर वो भी भागते भागते!”

उनकी बात सुनते ही मैं बोला, “ल... लेकिन यह बात आपको कैसे पता?”

मेरी बात सुनते ही मेरी बहन शगुन मुझे छेड़ती हुई बोली, “अरे यह पहली बार तो है नहीं, हर बार तो वही एक सपना देखते हो जिसमें वो तांत्रिक किसी कि खोपड़ी लिए तुम्हें डराता है और तुम भागते भागते उस कब्रिस्तान में मेरी चुड़ैल भाभी से टकरा जाते हो।”

उसकी यह बात सुनते मुझे गुस्सा आ गया और मैं बोला, “मम्मी इसको समझा लो, ये ना एक दिन पिटेगी मुझसे। यहाँ मेरी हालत खराब है और इसे मजाक की लगी है।”

मेरी बात पूरी होते ही शगून बोली, “किसने कहा कि मैं मजाक कर रही हूँ, देखना एक दिन तुम्हारी शादी किसी चुड़ैल से ही होगी वो भी खूंखार वाली।”

मुझे क्या पता था कि शगुन कि मजाक में कि गई बात भी एक दिन सच हो जाएगी। अब वह चुड़ैल मेरे कैसे पल्ले पड़ने वाली थी इसका जवाब तो आने वाले वक़्त के पास ही था।

मम्मी ने शगुन को अपनी आंखे दिखाती हुई बोली, “शगुन अब चुप हो जाओ ऐसा नहीं बोलते। तुम्हें पता है पूरे दिन में एक पल ऐसा आता है जब माँ सरस्वती जिह्वा पर वास करती है। खुदा न खास्ता यह वक़्त वही हुआ तो तो फिर सच में लेने के देने पड़ जाएंगे। इसलिए बेटी कभी किसी के लिए बुरा नहीं बोलते।

चलो तुम्हें निकलना था ना मैं तुम्हें रास्ते में खाने के लिए कुछ नमकीन, बिस्किट्स kitchen से ले आती हूँ।”

यह कहती हुई मम्मी kitchen कि तरफ चली गई। इस से पहले कि शगुन कुछ कहती तभी मेरे दादा जी बोले, “अरे अटल! तुम्हें तो थोड़ी देर में दिल्ली जाने वाले थे ना? फिर तुम्हें नींद कैसे लग गई?”

मैंने उन्हें जवाब देते हुए कहा, “वो दादा जी मुझे निकालने में डेढ़ घंटे का वक़्त था तो सोचा कि तब तक कोई मूवी देख ली जाए। तो मैं मोबाईल से movie देखने लग गया।”

शगुन को इसी मौके कि तलाश थी और अब फिर से आप मोर्चा संभालती हुई बोली, “पता है दादा जी जनाब कौन सी मूवी देख रहे थे? उस movie का नाम है ड्रेकुला!”

तभी दादा जी ने अपने दोनों भौहें चढ़ाते हुए बोले, “इस तरह कि movies देखते हो तभी दिमाग में इस तरह के ख्यालात आते हैं। इस तरह कि मूवीज नहीं देखनी चाहिए दिमाग पर इसका प्रतिकूल असर पड़ता है।”

मैं उसकी बातों को एनकाउन्टर करता हुआ बोला, “मैं आपकी बातों को मानता हूँ लेकिन दादा जी इस horror movie को टॉप मैं आज ही देख रहा था। आपको तो पता है कि मुझे हमेशा से ही एक ही सपना आता रहा है। जहां मैं एक बहुत बड़ा समुद्र देखता हूँ और मैं किसी टापू पर हूँ। इतना ही नहीं मैं उस टापू के आलीशान हवेली को भी देखता हूँ। जिसके बाहर मुझे एक अजीब सी चुड़ैल जिसके शरीर पर कोई चमड़ी नहीं है उसे देखता हूँ इतना ही नहीं एक तांत्रिक जिसके हाथ में अजीब सी किसी इंसान की क्रिस्टल खोपड़ी है वो सभी मेरे पीछे भागते हैं। मुझे इस सपने का मतलब समझ नहीं आता। आखिर यह सपना ही मुझे क्यों बार बार आता है।”

वो मेरी बात को सुनते हुए बोले, “बेटे मैं इतना कहूँगा कि कोई सपना अलग अलग आए तो वो लोग भूल भी जाते हैं क्योंकि उसका कुछ मतलब नहीं रहता। लेकिन तुम्हारे एक ही सपने का बार बार आना यह इस बात को प्रमाणित करता है कि तुम बहुत जल्द समुद्र, तांत्रिक या पारलौकिक शक्तियों से सामना होने वाला है। तो अटल मैं तुम्हें सावधान करना चाहूँगा कि आने वाला समय तुम्हारी कड़ी परीक्षा लेगी। तुम्हें अब मानसिक तौर पर खुद को तैयार कर लेना चाहिए और मैं चाहूँगा कि आज से ही कमर कस लो।”

“कहाँ जाने के लिए कमर कसवाई जा रही है कोई हमें भी तो बताए?” मम्मी यह कहती हुई कमरे के अंदर दाखिल हुई।

दादा जी बात बदले हुए बोले, “वो मैं अटल को बोल रहा था कि इतनी दूर जा रहा है अपना ख्याल रखना यूं ही सोते मत रह जाना।” उनका इतना कहना था कि शगुन और मैं एक साथ हँस पड़े। शगुन मेरी ओर देख कर हँस रही थी। शायद वह जाताना चाह रही थी कि यह बात मैंने कही होती तो मम्मी को सब सच बता देती। तभी मम्मी मेरी तरफ कुछ बिस्किट्स और नमकीन के packets बढ़ाती हुईं बोली, “अरे वो देख घड़ी में साढ़े नौ बज गए हैं। जल्दी से इसे रख नहीं तो तेरी बस भी छूट जाएगी।”

उनकी बात सुनते ही मैं बोला, “माँ, बस साढ़े दस बजे कि है। अभी बहुत वक़्त है।”

शगुन बोली, “हाँ... हाँ.. सही कहा भईया! तब तक आप वो क्या नाम था उस मूवी का... हाँ याद आया.. उस ड्रेकुला मूवी को पूरी कर लो।”

उसकी यह बात सुनते ही मुझे गुस्सा आ गया और मैं बोला, “माँ, समझा लो इसे! नहीं तो जाते जाते इसे ड्रेकुला बनाता जाऊंगा।”

मेरी बात खत्म होते ही शगुन मुझे चिढ़ाती हुई बोली, “अरे हाँ, बड़ा आया ड्रेकुला बनाने वाला, पहले अपनी सपने वाली चुड़ैल से तो मिल आ। और हाँ आते वक़्त उस चुड़ैल को साथ लेते आना और फिर जो मर्जी उसे बनाते रहना।”

उसकी इस बात ने मुझे गुस्सा दिला दिया। मैं जैसे ही उसे पकड़ने के लिए आगे बढ़ा मेरी माँ ने रोकते हुए कहा, “अरे अब बस भी करो लड़ना। वापिस आ कर जितना मन हो लड़ लेन। तू अब निकल जल्दी। वहाँ आधे घंटे पहले पहुँच जाएगा तो कोई बड़ी बात नहीं हो जाएगी। वैसे भी रात को ऑटो कम मिलते हैं यहाँ से।”

उनकी यह बात सुनते ही मैंने अपना पिट्ठूबैग अपने पीछे टांगा और माँ और दादा जी के पाँव छूते हुए बोला, “ठीक है माँ, मैं निकलता हूँ। वहाँ पहुंचते कॉल करूंगा।”

मेरी माँ ने आखिरी बार कहा, “ठीक है जा और अपना ध्यान रखना, खाने पीने कि चीजों में लापरवाही बिल्कुल भी ना करना।”

मैं अब घर से निकल चुका था। मुझे घर के बाहर ही ऑटो आसानी से मिल गया था। मैंने देखा कि घड़ी में ठीक 09:45 बजे का वक़्त हो रहा था। रात होने कि वजह से ट्रैफिक बहुत कम था। मेरे दिल में आज अजीब सी बेचैनी थी ऐसा लग रहा था कि कुछ गलत होने वाला है। मेरा दिल हो रहा था कि एक बार घर वापिस लौट जाऊँ लेकिन दुसरे तरफ दिमाग इसकी permission नहीं दे रहा था। वैसे भी अब मैं घर से निकल चुका था कि वापिस आने पर कई तरह के सवालों का सामना करना असंभव था। मैने अब सब किस्मत कर भरोसे छोड़ दिया।

दुनिया एक किताब है और जो यात्रा नहीं करते वो उसका बस एक पन्ना ही पढ़ पाते हैं। किसी ने कहा है, कहीं भी जाकर हम उतना ही घूमफिर सकते हैं, जितना हम थक सकें। यदि कोई मुझसे पूछे तो मैं तो यही कहूँगा कि थकावट तो बस मन कि स्थिति है। मगर घुमक्कड़ी का शौक को ज़िंदा रखने के लिए पैसा और समय दोनों साथ साथ चाहिए। यदि यह दोनों आपके पास है तो फिर निकाल चलिये मेरे साथ किसी नए जगह पर।

08 मार्च 2019, देहारादून आई॰एस॰बी॰टी॰, समय रात्रि 10:30 बजे#

मन में उल्लास, चेहरे पर हर्ष के भाव और कांधे पर घुमक्कड़ी का भार लिए मैं देहारादून के आई.एस.बी.टी. पहुँच चुका था। मुझे हमेशा से ही किसी नए जगह पर घूमने की लालसा पिछले 7 सालों से जो सवर हुआ था कि उसका क्रम अब भी जारी था। शिवालिक कॉलेज ऑफ इंजीन्यरिंग देहारादून से 2012 से उत्तीर्ण होने के पश्चात कभी नौकरी, कभी कुछ इंटरव्यूज, तो कभी किसी काम से, तो कभी विशेष प्लान बना कर मैने अपने अंदर घुमक्कड़ी प्रवृति को कभी थमने नहीं दिया था।  

हाँ वो बात अलगा है कि मेरे दोस्तों ने मेरी इस आदत के कारण कई उपनाम रखें जैसे घुमक्कड़, ट्रैवलर, backpacker, मस्तमौला तो न जाने किस किस नाम से उपाधि दिया। काफी लोगों मेरे इस घुमक्कड़ी रथ को रोकने की कोशिश की लेकिन वह अब तक वह सारे के सारे नाकामयाब ही रहे। बदले में मैने उनको नई नई जगह जा कर फोटो ले कर सोशियल साइटस पर अपलोड कर के और जला भुना देता था।

बहरहाल मैने अपनी बस को ढूंढने की कोशिश की जो वहाँ आस पास नहीं दिख रही थी।

“ओहह। मुझे कहीं देर तो नहीं हो गयी और बस खुल गई हो। नहीं नहीं बस की खुलने की तो पौने ग्यारह का वक़्त था।”

बस को वहाँ मौजूद ना होने पर मैं थोड़ा सा विचलित हो गया था। मैं लपककर inquiry counter पर गया। मैने खिड़की से झांक कर देखा तो वहाँ कोई भी मौजूद नहीं था। यह देखकर मैं झुँझला सा गया।

“ये ना सरकारी कर्मचारी कभी काम ही नहीं करना चाहते। हर सरकारी विभाग मे यही हाल है।”

मेरा यह कहना था की तभी मैने देखा की inquiry counter कर्मचारी आ कर अपनी सीट पर बैठने लगा। मैने हड्बड़ाते हुए उस से पूछा,

“ये दिल्ली जाने वाली सेमी डिलक्स बस कब तक आएगी?”

“अरे जनाब वो तो जा चुकी?”

“क्या बकते हो? ओहह! क्षमा कीजिएगा, लेकिन उसके departure का समय तो 11:45 का था।”

“घबराइए नहीं वो एक्ज़िट गेट के पास ही खड़ी होगी।”

मैने उसकी यह बात सुनी और फुर्ती से एक्ज़िट गेट की तरफ भाग चला। हालांकि मेरे पास समान के नाम पर बस वही एक पिट्ठू बैग था, जिसकी वजह से मुझे भागने मे कोई खास दिक्कत नहीं हुई। जैसे ही बाहर आया तो देखा की एक बस बाहर खड़ी थी। मैने तपाक से अपनी जेब से मोबाइल निकालकर बस नंबर की जांच की तो देखा कि वही बस है। मैं झट से उस बस मे चढ़ गया।

“Thanks God, शुक्र है कि मैने tickets ऑनलाइन ही बूक कर ली थी नहीं तो आज पहली बार मेरी घुमक्कड़ी पर लापरवाही का कलंक लग जाता।”,

मैं खुद से ही बड्बड़ाते हुए बस मे चढ़ने लगा तभी बस के दरवाजे के पास खड़ा एक व्यक्ति बोला, “क्या नाम है आपका और आपकी सीट नंबर कौन सी है?”

“अटल पैन्यूली, 7 नम्बर ”

मैने उसे जल्दीबाजी मे यह बात बोली और अंदर चला गया। लगातार भागते रहने कि वजह से मैं लगभग पसीने से भीग गया था।

“4,5,6 और वो रहा 7, चलो अब जल्दी से समान रखी जाये और ट्रेन कि रनिंग स्टेटस देखी जाए।”

मैने यह कहकर जल्दी से अपना समान ऊपर रख दिया। मैं जैसे ही अपनी सीट पर बैठने वाला ही था कि जोरदार धक्के से मेरा बैलेन्स बिगड़ गया और मैने लपक कर सामने वाली सीट को पकड़ लिया। यदि मैं ऐसा नहीं करता तो मेरी बत्तीसी झड़े ना झड़े लेकिन हां उन बत्तीसी से कुछ दांतों की संख्या अवश्य कम हो जानी थी।

मैने अपनी मुंडी घूमा के देखी तो एक लड़की अपनी सीट पर जल्दीबाजी मे बैठने की वजह से मुझे धक्का लग गया था। मैने वहीं उसी हाल मे उस लड़की कि तरफ देखते हुए आँखों से पूछने कि कोशिश की, यह क्या तरीका है?

उसने मुझे देखा और अपनी दोनों हाथों कि हथेलियाँ फैलाते हुए अपने कांधे को उचकाते हुए अपने दोनों आंखो को चौड़ी करते हुए ऐसे मुंह बनाया जैसे उसकी कोई गलती नहीं थी और मैं अपनी वजह से नीचे गिरा था।

मैं संभाल कर अपनी जगह से खड़ा हुआ और अपनी सीट की तरफ जाने को हुआ तो देखकर चौंक जाता हूँ की वह लड़की तो मेरी ही सीट पर बैठी है। मैं उसके करीब आ कर उसके सामने खड़े हो जाता हूँ। मैं अपने शर्ट की कॉलर ठीक करता हूँ और उसकी तरफ देखते हुए जैसे ही उसे उसकी गलती का एहसास करवाना चाहता हूँ, उसे देखने लगता हूँ। तभी वह मेरी तरफ अपनी right hand को बढ़ाते हुए अपनी हथेली से दो बार चुटकी बजाती हुई बोलती है,

“O! hello mister, पूरी तरह ताड़ लिया है या अब भी और कोई कसर बाकी है। Look I am so depressed, please don’t disturb me.”

मैं उसके सामने खड़ा तो उसे झिड़कने के लिए हुआ था, लेकिन उसकी सुडौल छरहरी काया, झील सी गहरी आंखे, उस से matching eye लाइनर, कश्मीरी सेब के जैसे गाल और गुलाब की पंखुड़ियों जैसे होंठ के ठीक नीचे काला तिल से नजर ही नहीं हट रही थी। मैं अपलक उसकी खूबसूरती को अपने दिल की गहराई मे उतारे जा रहा था जैसे कोई चकोर किसी चाँद की चाँदनी चुरा रहा हो। 

यह पहला मौका नहीं था जब मेरे साथ इस तरह की घटना पहली बार हो रही हो। जब मैं कॉलेज में गया था तो, कॉलेज के पहले ही दिन मेरी ठीक इसी तरह से प्रियंका धस्माना से नोंक झोंक हो गयी थी। वाह भी बस ज़रा सी बात पर।

दरअसल हुआ यह था की क्लास के खत्म होते ही काफी सारे students लाईब्रेरी के पास 1st Semester की  books issue करवाने के लिए boys & girls सभी एक ही queue में लगे हुए थे। मैं भी उसी queue मे लगा हुआ था और अपनी बारी का wait कर रहा था। 

हालांकि आज सबका पहला ही दिन था और teachers पर day one से ही अच्छा खासा impression झाड़ने के लिए students मे books को आज ही पा लेने की बेताबी ज्यादा थी। हाँ वो बात अलग थी कि semester के 1st internal exams से पहले वह books कोई छूने वाला था नहीं। यह भी एक कड़वी मगर सच बात थी।

काफी देर से खड़े खड़े मेरे पाँव मे अब दर्द होने लग गया था। सुबह एक बार क्लास मे बैठने के बाद मैं बाहर नही निकला था जिसकी वजह से अब मुझे toilet जाने कि भी प्रबल इच्छा हो चली थी। मैने देखा की ठीक मेरे आगे एक भूरे बालों वाली लड़की खड़ी थी। फिर मैने पीछे मुड़कर देखा तो पीछे भी कोई पतली मरियल सी दुबली पतली लड़की खड़ी थी।

मैने उसे देखते ही माथा ठोंक लिया। मेरा ऐसा करने से उसने मेरे इस reaction का गलत मतलब निकाल लिया। वह मुझे अपनी आंखे गुस्से से दिखाने लगी। अगले ही पल मुझे अपनी भूल का एहसास हुआ और मैंने आगे पलटकर अपने दांतों से जीभ दबाते हुए बोला, “Ohh! Shit, कहीं इस लड़की ने ऐसा तो नहीं सोच लिया की इसकी chasis जैसी body को देखकर मैने ऐसा reaction दिया है। धत्त तेरी की अब इस दधीचि की हड्डी को क्या कहूँ? छोड़ न वो जो समझती है समझे मुझे क्या है?”

यह कहते हुए मैने अपने से आगे खड़ी लड़की को बोला, “Excuse me please!”

उसने कोई प्रतिक्रिया नहीं दिया शायद मेरी आवाज उसके कानो तक नहीं पहुँच पाई थी। मैने अपने गले को साफ किया और इस बार दुबारा से उससे बात करने की कोशिश की और इस बार थोड़ी ज़ोर से बोला,

“Excuse me please! I am Atal Painyuli.”

मेरी आवाज इस बार भी उस तक नहीं पहुंची। काफी rush होने की वजह से मेरी आवाज आस पास की आवाज के साथ मिलकर ही दब जा रही थी। ऐसा होना लाजिमी ही था क्योंकि भीड़ जो खतरनाक थी। 

मैं इस बार खुद से ही बड़बड़ाया, “हा...हा...बड़ा आया था अपना नाम लड़की को नाम बताने वाला, साले किसी की आवाज यहाँ सुनी जा नहीं पा रही और जनाब गले से राग बैठा कर आवाज निकाल रहें है।”

मैने इस बार थोड़ा सा साहस जुटाया और इस बार सीधे आगे खड़ी उस लड़की के कांधे पर हाथ रख दिया। मेरा ऐसा करते ही वो झट से पलट गयी और अपनी पलकों को उठाते हुए गुस्से से बोली, “What the hell? Have you gone crazy? 

बिना छुवे बात नहीं हो सकती क्या? तुम जैसे लड़कों को मैं अच्छी तरह से जानती हूँ, बस मौका मिलता नहीं कि लगे अपना उल्लू सीधा करने।”

मैं उसे टकटकी लगाकर देखता रह गया था। वो साक्षात माँ दुर्गा के अवतार में दिख रही थी और देवी के हाथों अब बस इस माहिशासुर का वध होने ही वाला है। उसने अपनी कलाई ऊपर उठाई और उससे दो बार चुटकी बजते हुए बोली, “O Hello Mister! ताड़ना बन्द हुआ हो तो बताओगे कि ये क्या हिमाकत की थी?”

“जी...जी...वो...मैं...मैं...!”

“अरे ये क्या किसी बकरी कि तरह मिमियाने लगे, जल्दी बोलो मुझे और भी काम है!”

मैने घबराते हुए उस से बोलने कि कोशिश की, “ मैं थोड़ी देर के लिए बाहर घूम के आऊँ क्या फिर मैं इस line मे अपनी जगह पर आ जाऊंगा।”

“हम क्या बेवकूफ हैं जो इतनी देर से line मे लगे हुए हैं। हमलोग क्या अपनी मर्जी से लगे हुए हैं यहाँ line में।”

“अरे मैं कैसे बताऊँ तुम्हें, बस यह जान लो कि थोड़ी emergency है समझने की कोशिश करो।”

“हाँ हाँ क्यों नहीं? अब हिरोशिमा और नागासाकी के बाद यहाँ atom bomb गिरने वाला है इसलिए तुम यहाँ से भाग जाना चाहते हो, क्यों mister सही कहा न मैंने?”

उसकी बहस ने मुझे अपनी नानी याद दिला दी थी। मेरे अंदर उस से बहस करने का साहस नहीं था क्योंकि pressure की वजह से अब मेरा सामर्थ्य भी जवाब देने वाला था। 

हाँ यह तो अब तय हो गया था कि atom bomb गिरे न गिरे, लेकिन मैं यहाँ 2 मीनट और रुक गया तो सुनामी ज़रूर आ जाती। और वह सुनामी ऐसी जगह से आती की बस मुझे ही बहा ले जाती। 

मुझे कोई और उपाय न सूझता दिख मैने अपना left hand ऊपर किया और अपनी हथेली कि सारी उँगलियाँ मोड़ते हुए कनिष्ठ (last वाली छोटी) उंगली उठा दी।

मेरे इस इशारे ने मेरा काम बना दिया और अपने दोनों हाथों से मुंह ढककर हँसने लग गयी। मैं भाग के washroom कि तरफ गया। वहाँ मेरी नजर washroom के दरवाजे के ऊपर पड़ी जहां लिखा था “ONLY FOR STAFF”, 

“अरे आज college का पहला दिन ही तो है, मुझे कौन सा यहाँ कोई पहचानत है। मैं तो बस यूं जाऊंगा और यूं बाहर आ जाऊंगा।”

यह कहकर मैं बिजली कि फुर्ती से अंदर घूँस गया और अविरल धारा को प्रवाहित कर के सुकून पाया। मैं जैसे ही बाहर निकालने को हुआ तो मुझे कोई आहट सुनाई दी, ऐसा लग रहा था जैसे कोई अन्दर आने वाला है। 

मैने सरसरी निगाह से देखने की कोशिश की तो मेरे मुंह से यह निकाल पड़ा, “अरे! ये तो विवेक पाण्डे Sir हैं, जिन्होनें  आज class मे सभी students का introduction लिया था और जब मैने खुद को हिन्दी में introduce किया था तब मुझ से चिढ़ गए थे और बरसते हुए बोले थे कि, अब हिन्दी का साथ अगले 4 साल तक छोड़ दो क्योकि यहाँ सारी पढ़ाई इंग्लिश मे ही करनी है, यहाँ तक कि किसी से बात भी।”

“उन्हें मेरा नाम याद हो न हो लेकिन मेरा चेहरा अब तक नहीं भूले होंगे। ओहह! अब मैं क्या करूँ? ये तो वही बात हो गयी आ बैल मुझे मार।”

मैने देखा कि washroom को अन्दर से दो हिस्सों मे विभक्त किया गया था। बाजू मे ही दरवाजा लगा हुआ था। वह हिस्सा शौच करने के लिए अलग से बनाया हुआ था। मारता ना क्या करता, मैं भाग के वहाँ अन्दर घूँस गया और कुंडी लगा ली।

मेरे कुंडी लगाते ही वह washroom के अन्दर आ गए। मैने कुछ देर तक वहाँ अचेत सा पड़ा रहा। मेरे लिए अब वहाँ कि बदबू को झेल पाना बर्दाश्त से बाहर हो चला था। लेकिन मरता न क्या करता? मुझे हालात से समझौता करना ही पड़ा।

“मुझे लगता है कि अब मुझे चलना चाहिए, लेकिन मैने उनके जाने कि आहट तो सुनी नहीं? अरे तो वो भला इतनी देर अन्दर क्या करेंगे? चलो अब चलते ही हैं।”

मैने जैसे ही यह कहकर चिटकनी खोली ही थी कि मैने सामने विवेक पाण्डे sir को देखा जो कि दूसरी तरफ देख रहे थे। मैने झट से दरवाजा बन्द करते ही दुबारा से ज़ोर से चिटकनी लगा ली।

“ओहह! बाल बाल बचा आज तो। यह बुढ़ऊ तो अभी तक यहीं खड़ा है! कहीं इसे पता तो नहीं लग गया कि मैं अन्दर हूँ और मुझे punishment देने के लिए मेरा बाहर wait कर रहा हो। अरे दादा, अब क्या होगा?”

मेरे दिमाग मे कई तरह कि अटकलें चल रहीं थी तभी दरवाजे पर किसी ने knock करते हुए बोला, “O hello, कौन है अन्दर? यह क्या मज़ाक लगा रखा है? बार बार दरवाजा खोल के lock कर दे रहे हो! Please come outside, दूसरों को भी मौका दो।”

“अरे! यह तो विवेक पाण्डे sir कि आवाज है। अब तो बेटा अटल तू गया काम से। तुझे ज़रूर sir ने दरवाजे को खोलते वक़्त देख लिया होगा।”

अब तो मैं बी तरह से फंस गया था मेरी समझ मे कुछ भी नहीं आ रहा था कि अब मैं क्या करूँ की तभी....