Read Hindi Horror Story - Rahasyamayee Safar Part 1/60 | परिये भूतों की कहानी - रहस्यमयी सफर (भाग- 1/60) - Dingdongdom Stories

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रहस्यमयी सफर (भाग- 1)

रात का खाना खाने के बाद हवेली में घुप्प अन्धेरा छा गया था। मेरे कमरे में एक लालटेन मद्धिम रोशनी में जल रही थी। बाहर अब बारिश बहुत तेज बारिश हो रही थी। बारिश कि तेज छींटों की आवाज से ऐसा लग रहा था कि यह पूरी रात ऐसे ही अपना कहर ढाती रहेगी। आज रात मैं पूरी हवेली में अकेला था जिसकी वजह से मुझे नींद भी नहीं आ रही थी।

“अटल, भाग जाओ यहाँ से...!”

अचानक बाहर से किसी कि आवाज आई। जिसे सुनते ही मैं अपने बिस्तर पर बैठ गया। मैं अपने आप से बुदबुदाया, “ओह! इतनी रात गए कौन हो सकता है? वो भी इतनी तेज बारिश में? खैर जो भी कोई हो मुझे एक बार और उसके अगले आवाज कि प्रतीक्षा करनी चाहिए।”

यह कहकर मैं चुपचाप उसी स्थिति में बैठा रहा लेकिन काफी देर तक बैठे रहने के बावजूद भी वह आवाज दुबारा नहीं आई। मैंने बिस्तर पर पसरना ही उचित समझा और फिर अपनी टाँगे फैलाकर लेट गया। मैंने जैसे ही बिस्तर पर पड़े चादर को अपने हाथ बढ़ाकर उठाने कि कोशिश कि तभी लालटेन बुझ गया। 

लालटेन के अचानक बुझने से मेरे शरीर में झुरझुरी दौड़ गई। अचानक दरवाजे पर किसी कि दस्तक हुई। ऐसा लगा कि जैसे किसी ने अपने हाथ से दरवाजे को थपकी दी थी।

वो तो शुक्र था कि माचिस कि डिब्बी मेरे सिरहाने ही रखी हुई थी। मैंने झट से माचिस कि तिल्ली जलाई और लालटेन कि तरफ जाने लगा। वह लालटेन दरवाजे के पास ही एक खूँटी पर टंगी हुई थी। मैं दबे पाँव उस ओर बढ़ रहा था कि तभी

“आह्हsss”

मेरे मुंह से चीख निकल गई। तिल्ली कि पूरी जल जाने कि वजह से मेरी उंगली झुलस गई थी। मैंने अपनी उन उंगलियों को मुंह में कुछ देर डाले रखा। मैंने फिर से माचिस से एक तिल्ली निकालकर फिर से लालटेन को जला दिया। 

मैंने देखा कि हवाओं के तेज चलने कि वजह से वह लालटेन बुझ गई थी। मैं वापिस आ कर बिस्तर पर लेट गया। जैसे ही मैंने अपनी आँख बंद किए ही थे कि तभी वह आवाज फिर से आई...

“अटल, भाग जाओ यहाँ से...!”

यह आवाज दुबारा आई तो इस बात मैं कांप गया।

“अरे यह आवाज इतने पास से कैसे आ सकती है। ऐसा लग रहा है जैसे कोई बाहर ही खड़ा है। इस हवेली के अंदर कोई कैसे आ सकता है? कहीं मैंने दरवाजा खुला तो नहीं छोड़ दिया था। कुछ भी हो मुझे दरवाजे को खोलकर देखना चाहिए?”

मन ही मन यह कहते हुए मैं उस दरवाजे के तरफ बढ़ चला। मैंने वहाँ पास में ही लालटेन को दुबारा उस खूँटी से उतारा और अपने हाथ में ले लिया। मैंने एक गहरी सांस ली और बोला, “क...  कौन है वहाँ? मैं पूछता हूँ कि तुम अंदर कैसे आए?”

मेरे ऐसा कहने के बाद दरवाजे के उस तरफ से कोई भी आवाज नहीं आई। इस बार मैं गुस्से से बोला, “देखो मैं आखिरी बार बोल रहा हूँ कौन हो बताओ और तुम अंदर कैसे चले आए?”

मैंने धीरे से छिटकनी खोली तो देखा कि वहाँ कोई भी मौजूद नहीं था। नीचे कि तरफ सीढ़ियाँ जा रहीं थीं। मैं अपने हाथ में लालटेन लिए उन सीढ़ियों से नीचे जाने लगा। मेरे हर बढ़ते कदम के साथ मेरे कदमों कि प्रतिध्वनि मेरे कानों तक पहुँच रही थी। मैं अब नीचे आ चुका था। नीचे दरवाजे के पास खड़ा था। उसे खोलते ही मैं उस हवेली के बाहर आ जाता।

मैंने जैसे ही उस दरवाजे को खोला यह देखकर दंग रह जाता हूँ कि बाहर भी कोई मौजूद नहीं था। मुझे सबसे बड़ी हैरानी तो तब हुई जब मैंने देखा कि बाहर बारिश  ही नहीं हो रही थी। 

मुझे अपने आँखों पर बिल्कुल भी विश्वास नहीं हो रहा था। मेरा इन बातों पर विश्वास करना बहुत मुश्किल हो रहा था। फिर भी मैंने नीचे झुक कर जामन को छु कर देखना चाहा। मैंने जमीन को छूते ही कहा,

“अरे यहाँ तो जमीन भी बिल्कुल सुखी हुई है। इसका मतलब तो यह है कि यहाँ बारिश बिल्कुल भी नहीं हुई है? भला यह कैसे possible हो सकता है। इतनी देर से बारिश हो रही थी। 

मैंने खुद अपनी खिड़की से बिजली के कड़कने के साथ बारिश को होते हुए भी देखा था। कहीं मैं कोई सपना तो नहीं देख रहा था? न... नहीं.... यह कोई सपना नहीं हो सकता। मैंने बारिश कि बूंदों को खुद अपने चेहरे पर महसूस किया था।”

मैं यह कहकर खड़ा उठा ही था कि तभी देखा कि हवेली के main gate के बाहर बाहर कोई सफेद साया खड़ा है। चंदिनी रात थी जिसकी वजह से वह साफ साफ नजर आ रहा था। उसे देखते ही मैं बोला, “कौन है वहाँ? रात के इस वक़्त वहाँ क्या कर रहे हो?”

उसने जवाब में कुछ नहीं बोला। मैंने घड़ी में वक़्त देखा तो रात के ठिक 12 बजे का वक्त हो रहा था। मैंने उस लालटेन को वहीं रखा और उसकी तरफ जाने लगा। 

मेरे दिल में एक बार विचार आया कि मुझे उस तरफ नहीं जाना चाहिए लेकिन दूसरी तरफ मेरा दिमाग कह रहा था कि मुझे जानना चाहिए कि वह सफेद चादर में कौन है? तो फिर क्या इस बार भी दिल के फैसले पर दिमाग हावी हो गया और मैं अब उस अजनबी साये के सामने था।

“बोलते क्यों नहीं, रात के इस वक़्त यहाँ क्या कर रहे हो?”

मेरा इतना कहना ही था कि तभी वह मेरी तरफ मुड़ा। उसने अपने पूरे शरीर को एक सफेद चादर से ढका हुआ था। उसके शरीर से अजीब से बदबू आ रही थी। ऐसा लग रहा था कि जैसे मैं कुछ देर और रुक तो मैं उलटी कर दूंगा। अचानक वह साया बोला, “अटल, भाग जाओ यहाँ से...!”

उसकी इस बात से इस बार मुझे गुस्सा आ गया और मैं बोला, “तुम्हें मेरा नाम कैसे पता है? और... और तुम मुझे यहाँ से भागने के लिए क्यों बोल रहे हो? आखिर तुम होते कौन हो मेरी ही हवेली से मुझे भगाने वाले।”

यह कहते के साथ मैंने उसके जिस्म से जैसे ही सफेद चादर को खींचा तो मेरे हलक में प्राण आ गया। वह कोई चुड़ैल कि तरह दिख रही थी। उसकी पूरी जिस्म पर किसी भी प्रकार कि चमड़ी नहीं थी। ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने उसके पूरे शरीर से चमड़ी ही निकाल दी हो। 

उसके पूरे जिस्म से खून कि बूंदे टपक रही थीं। यह बूंदे धरती पर पड़ते ही गायब हो जा रहीं थी। अगले ही पल उसने अपने दायें हाथ को अपने बाएं सीने में घुसाया और अपने सीने से दिल को बाहर निकाल लिया। उसके हाथ में दिल होने के बावजूद भी वह धड़कता हुआ दिख रहा था।

यह देखते ही मैं कांप उठा। मुझे अपने आँखों पर विश्वास नहीं हो रहा था कि यह सब मैं अपने आँखों के सामने देख रहा था। वह चुड़ैल अब डरावने होने के साथ घिनौनी ज्यादा लग रही थी। तभी वह मेरी तरफ झुकी और बोली, “अटल ले इसे तू भी चख! बड़ा स्वादिष्ट है। इसे खाने के बाद यह जिसका दिल है ना उसी कि तरह हो जाएगा, सच! हाँ... हाँ... हाँ...!”

यह कहने के बाद हवेली के अंदर जाने वाली main gate पर जा खड़ी हुई। वो जोर जोर से हँसने लगी। उसकी इस हरकत से मैं बहुत डर गया और हवेली से बाहर जाने वाली रोड कि तरफ भाग पड़ा। मैं बेतहाशा भागे जा रहा था। उसकी चीख और भी तेज होती चली जा रही थी।

उस चुड़ैल का चेहरा बहुत ही भयानक था जिसे देखते ही कोई भी अपने होश खो सकता था। रात आहिस्ता-आहिस्ता और गहराती जा रही थी और मैं परेशानियों की मझदार में डूबती जा रहा थी। 

मेरा दिमाग अन्धेरे में घिरता चला गया। मैं लगातार भागता ही रहा और भागते भागते बहुत दूर आ गया था । अब मुझे यह भी नहीं पता चल रहा था कि यह रात का न जाने कौन-सा पहर था?

चारों तरफ रात का डरावना सन्नाटा छाया हुआ था, मगर मेरे अन्दर न जाने कौन-सी ताकत आ गई थी जो मुझे लगातार भागने में बाल प्रदान कर रही थी। 

मैंने हिम्मत अभी भी नहीं हारी थी और वीरान, सुनसान खेतों में से होता हुआ भगत चल गया। हर तरफ अन्धेरे की चादर फैली हुई थी और आखिरी रातों का चाँद अपनी बेबसी पर मातम मना रहा था। भागते हुए उस चुड़ैल के रूप में वह खौफनाक और भयानक चेहरा मेरे जेहन में ताजी थी।

खेतों और खलियानों के पेड़ जिन्न और भूतों की तरह नजर आ रहे थे। खौफ और दहशत के मारे मेरा पूरा जिस्म पसीने से तर हो गया था धड़कनें बेकाबू होती जा रही थीं, चारों तरफ सन्नाटे का आलम था। 

मैं बस भागता ही जा रहा था। भागते भागते मैं इतनी दूर आ गया था कि मुझे अपने दोनों तरफ समुद्र नजर आने लगा। चंदिनी रात और चाँद के आज धरती के ज्यादा करीब होने कि वजह से समुद्र कि लहरें उफान पर थी। उनकी ऊंची ऊंची लहरें मेरे जिस्म में खौफ पैदा कर रहीं थी। 

उन लहरों का स्वर मेरे कानों में पड़ रही थी जिसे मैं साफ साफ सुन सकता था। तभी मुझे सामने एक बहुत बड़ा कब्रिस्तान नजर आ गया। कब्रिस्तान को सामने पा कर मेरे दिल की धड़कन कुछ और बढ़ गईं, लेकिन इस वक़्त मेरे उसके सिवा मुझे कोई दूसरा रास्ता नजर नहीं आ रहा था।

उस कब्रिस्तान में हल्की-हल्की रोशनी की किरणें थीं, वो उस कब्रिस्तान की मौजूदगी का एहसास कर रही थीं। मैं उस कब्रिस्तान के करीब आया तो देखा कि एक कब्र के ऊपर कोई इंसान बैठ हुआ है। 

किसी जिन्दा इंसान की मौजूदगी ने मेरे अंदर जान डाली। उसे देखकर मेरी जान-में-जान आई और दिल को कुछ हौसला मिला। मैं उसके पास गया मगर वहां का मंजर देखकर मेरे गले से एक तेज चीख निकल गई। 

वहाँ वही भयानक, घृणित शक्ल वाली चुड़ैल लम्बे-लम्बे बाल बिखेरे कफन में लिपटे एक बच्चे को लोरी सुना रही थी। मैं उलटे पांव पीछे को भागी, लेकिन वो घृणित औरत न जाने किस तरह मेरे सामने आन खड़ी हुई। उसकी शक्ल निहायत ही खौफनाक और भयानक थी और आँखों से शोले निकल रहे थे।

मेरे दोनों तरफ समुद्र था इसलिए मैं पलट कर वापिस भागने को हुआ ही था तभी वहाँ एक तांत्रिक दिखा। उसके एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे हाथ में एक मानव कंकाल खोपड़ी थी। 

वह मानव कंकाल खोपड़ी चाँद कि रोशनी पड़ने कि वजह से ज्यादा चमक बिखेर रही थी, ऐसा लग रहा था कि मानो जैसे वह इंसानी खोपड़ी किसी क्रिस्टल से निर्मित हो। वह तांत्रिक उस मानव खोपड़ी के ऊपर त्रिशूल को उसके चारों तरफ घुमाते हुए, अपनी आँखों को गोल गोल घुमाते हुए अजीब से मंत्र उच्चारण कर रहा था।

"हा-हा-हा-ही-ही-ही।" अचानक उसने क्रूर और भयानक कहकहे लगाने शुरू कर दिए।

उन कहकहों के साथ-साथ उसका खौफ मेरे दिल में घर बनाता जा रहा था।

“हे भगवान बद्रीनाथ मुझे इन शैतानों से बचा ले।”

अपनी मौत को अपने इतने करीब देखकर जिस्म की सारी ताकत खत्म होने लगी थी। मेरा मन अंधेरों में डूबने लगा। मैं जिंदा रहना चाहता था मैं पागलों की तरह चीखता- पुकारता हुआ अपने आपको उस चुड़ैल और उस तांत्रिक से बचाने के लिए कब्रिस्तान में दौड़ रहा था, लेकिन मुझे कब्रिस्तान से निकलने का कोई भी रास्ता नहीं मिल रहा था। 

हर तरफ कब्रें ही कब्रें दिखाई दे रही थीं। खौफ और भय की वजह से मेरे पूरे जिस्म में सनसनाहट फैली हुई थी। मेरे जिस्म का रोयां-रोयां मारे डर के कांप रहा था। इधर-उधर दौड़ते हुए मैं उस तांत्रिक से टकरा गया और नीचे धरती पर गिर पड़ा। उस तांत्रिक ने मुझे देखा और जोर से बोला,

“तुझे कहा था ना कि भाग जा यहाँ से.... लेकिन तूने यहाँ इस टापू के इस कब्रिस्तान में आ कर अपनी मौत को दावत दी है। अब मरने के लिए तैयार हो जा!”

उसने यह कहते के साथ अपनी दोनों आँखों को बंद किया और उस त्रिशूल को मेरी तरफ फेंक दिया। वह त्रिशूल क आधा हिस्सा मेरे सीने को भेदते हुए पीठ से बाहर निकल चुका था। मैं जोर से चीखा,

“नहीं मुझे बचा लो, मैंने तुम लोगों का क्या बिगाड़ा था। मैं इतनी जल्दी मरना नहीं चाहता!”